
4:9सामरी औरत ने ताज्जुब किया, क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ ताल्लुक़ रखने से इनकार करते हैं। उसने कहा, “आप तो यहूदी हैं, और मैं सामरी औरत हूँ। आप किस तरह मुझसे पानी पिलाने की दरख़ास्त कर सकते हैं?”
10:25एक मौक़े पर शरीअत का एक आलिम ईसा को फँसाने की ख़ातिर खड़ा हुआ। उसने पूछा, “उस्ताद, मैं क्या क्या करने से मीरास में अबदी ज़िंदगी पा सकता हूँ?”
26ईसा ने उससे कहा, “शरीअत में क्या लिखा है? तू उसमें क्या पढ़ता है?”
27आदमी ने जवाब दिया, “‘रब अपने ख़ुदा से अपने पूरे दिल, अपनी पूरी जान, अपनी पूरी ताक़त और अपने पूरे ज़हन से प्यार करना।’ और ‘अपने पड़ोसी से वैसी मुहब्बत रखना जैसी तू अपने आपसे रखता है’।”
28ईसा ने कहा, “तूने ठीक जवाब दिया। ऐसा ही कर तो ज़िंदा रहेगा।”
29लेकिन आलिम ने अपने आपको दुरुस्त साबित करने की ग़रज़ से पूछा, “तो मेरा पड़ोसी कौन है?”
30ईसा ने जवाब में कहा, “एक आदमी यरूशलम से यरीहू की तरफ़ जा रहा था कि वह डाकुओं के हाथों में पड़ गया। उन्होंने उसके कपड़े उतारकर उसे ख़ूब मारा और अधमुआ छोड़कर चले गए। 31इत्तफ़ाक़ से एक इमाम भी उसी रास्ते पर यरीहू की तरफ़ चल रहा था। लेकिन जब उसने ज़ख़मी आदमी को देखा तो रास्ते की परली तरफ़ होकर आगे निकल गया। 32लावी क़बीले का एक ख़ादिम भी वहाँ से गुज़रा। लेकिन वह भी रास्ते की परली तरफ़ से आगे निकल गया। 33फिर सामरिया का एक मुसाफ़िर वहाँ से गुज़रा। जब उसने ज़ख़मी आदमी को देखा तो उसे उस पर तरस आया। 34वह उसके पास गया और उसके ज़ख़मों पर तेल और मै लगाकर उन पर पट्टियाँ बाँध दीं। फिर उसको अपने गधे पर बिठाकर सराय तक ले गया। वहाँ उसने उस की मज़ीद देख-भाल की। 35अगले दिन उसने चाँदी के दो सिक्के निकालकर सराय के मालिक को दिए और कहा, ‘इसकी देख-भाल करना। अगर ख़र्चा इससे बढ़कर हुआ तो मैं वापसी पर अदा कर दूँगा’।”
36फिर ईसा ने पूछा, “अब तेरा क्या ख़याल है, डाकुओं की ज़द में आनेवाले आदमी का पड़ोसी कौन था? इमाम, लावी या सामरी?”
37आलिम ने जवाब दिया, “वह जिसने उस पर रहम किया।”
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